सुप्रीम कोर्ट में NALSAR छात्रों की याचिका, BCI चेयरमैन के आदेश की जांच की मांग
Published by : Raj Kumar
नई दिल्ली: NALSAR University of Law के दो पूर्व छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए Bar Council of India (BCI) के चेयरमैन द्वारा विश्वविद्यालय के छात्रों के खिलाफ जारी किए गए निर्देशों के तरीके की जांच की मांग की है। याचिका में यह सवाल उठाया गया है कि क्या BCI चेयरमैन को ऐसे निर्देश जारी करने के लिए बार काउंसिल की विधिवत बैठक से अधिकृत किया गया था।
मामला NALSAR के दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने के विरोध में छात्रों द्वारा चलाए गए अभियान से जुड़ा है। BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने विश्वविद्यालय से अभियान में शामिल छात्रों की पहचान करने और वर्ष 2026 में स्नातक हुए छात्रों के नामांकन पर रोक लगाने संबंधी निर्देश जारी किए थे। हालांकि, बाद में इन निर्देशों को वापस ले लिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
याचिका का उल्लेख वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष किया। सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिया कि BCI या किसी भी Bar Council द्वारा इस मामले से संबंधित NALSAR के छात्रों या फैकल्टी के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाए।
छात्रों के नामांकन पर रोक को लेकर उठे सवाल
याचिका में कहा गया है कि छात्रों द्वारा किसी अभियान में भाग लेना Advocates Act, 1961 के तहत अधिवक्ता के रूप में नामांकन से अयोग्य ठहराए जाने का आधार नहीं है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि Advocates Act की धारा 24A में नामांकन से अयोग्यता के निर्धारित आधार दिए गए हैं और छात्र अभियान में भाग लेना या विश्वविद्यालय स्तर की जांच लंबित होना उनमें शामिल नहीं है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी मुद्दा
याचिका में छात्रों की ओर से विश्वविद्यालय के आंतरिक स्तर पर दी गई आपत्ति को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षित अभिव्यक्ति बताया गया है।
याचिका के अनुसार, किसी संवैधानिक पदाधिकारी को दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किए जाने पर असहमति व्यक्त करना या उस निर्णय पर पुनर्विचार की मांग करना शांतिपूर्ण और वैध अभिव्यक्ति के दायरे में आता है।
BCI के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल
याचिका में दावा किया गया है कि Advocates Act, 1961 BCI को NALSAR जैसे विश्वविद्यालयों के आंतरिक मामलों या नामांकन से पहले छात्रों के आचरण को नियंत्रित करने की शक्ति नहीं देता।
याचिकाकर्ताओं ने Advocates Act की धारा 6, 7 और 24A का हवाला देते हुए BCI के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए हैं।
याचिका में क्या मांग की गई?
याचिका में BCI द्वारा जारी दोनों पत्रों को रद्द करने, पत्र जारी किए जाने की प्रक्रिया की जांच कराने और NALSAR के छात्रों या फैकल्टी के खिलाफ इस मामले में अनुशासनात्मक, दीवानी या आपराधिक कार्रवाई से BCI को रोकने की मांग की गई है।
मामले की सुनवाई के दौरान छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणियां सामने आईं।
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